नेताजी सुभाष चंद्र जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।

राजेन्द्र देवांगन
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सुरेश सिंह बैस की लेखनी से

२३ जनवरी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जयंती अवसर पर
रगों में उबाल ला देने वाले ओजस्वी वाणी वाले स्वतंत्रता सेनानी सुभाष चन्द्र बोस


“तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा।”_ऐसा तेजस्वी और ओजस्वी नारा देने वाले ने सोचिए जब सारा देश गुलामी की जंजीरों से आजाद होने के लिए तड़प रहा था!

मरने मारने पर उतारू था! तब इस ऐसे नारे का लोगों में कैसा प्रभाव पड़ा होगा? उस व्यक्ति का लोगों में कैसा विश्वास जमा होगा! स्वाभाविक रूप से समझा जा सकता है। ऐसे नारे को जीने वाले व्यक्ति और कोई नहीं नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे।

जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व बलिदान कर दिया।

भारतीय स्वतंत्रता के महान सेनानी सुभाष चंद्र बोस जन्मजात योद्धा थे। नेताजी ने देश को गुलाम करने वाले ब्रिटिश साम्राज्य से सीधे टक्कर लिया था।

ऐसे महान राष्ट्रवीर का जन्म 23 जनवरी सन 1889 ईस्वी में कलकत्ता में हुआ था। नेताजी कॉलेज की पढ़ाई के समय से ही नेतृत्व और स्वतंत्रता के लिए मचलने लगे थे !

उन्होंने तो ऐ सी एस यानी आज की इंडियन एडमिनिस्ट्रेशन सर्विस( आईएएस) की परीक्षा में उत्तीर्ण होकर उच्च पद के लिए चुने जाने के बाद उन्होंने तत्काल छोड़ने का मन बना लिया था।

क्योंकि वह विदेशी सरकार के द्वारा दिया गया पद था। इसलिए उन्होंने इतने बड़े पद का त्याग करने में जरा भी संकोच नहीं किया।

नेताजी का विचार था कि भारत को आजादी मात्र दस वर्षों में ही मिल सकती है। बस शर्त यह है कि भारत के लोग उसका मूल्य देने को तत्पर रहें ।साथ ही उन्होंने यह भी कहा था कि अगर सब स्वार्थ में लगे रहेंगे तो वर्षों भारत को आजाद नहीं करा सकते।

उन्होंने सभी भारतीयों को इसके लिए आह्वान किया कि ब्रिटिश सरकार से सभी को तत्काल संबंध तोड़ देनी चाहिए।

इसी समय महात्मा गांधी का असहयोग आंदोलन भी विश्व भर के भारतीयों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर रहा था ।

सुभाष ने भी आंदोलन में भाग लेने का निश्चय कर लिया और स्वदेश लौटते ही स्वतंत्रता संघर्ष में कूद पड़े ।लेकिन सुभाष की नीति और गांधी की नीति मेल नहीं खाई।

नेताजी उग्रवादी विचारों से भरे थे। उनका विचार था कि हमारी ही भूमि पर हमारे भाई बहनों पर अत्याचार तुम लोग तो (ब्रिटिश सरकार )हिंदुस्तान की धरती पर व्यापार करने आए थे

और यहां आधिपत्य ही जमा लिया! वे खून का बदला खून की नीति से ब्रिटिश हुकूमत को उखाड़ना चाहते थे !

जबकि वहीं गांधी उदारवादी नीति पर चलना चाहते थे !इसी मतैक्य के कारण दोनों का साथ ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाया !यही कारण है कि सुभाष ने 1939 ईस्वी में एक नई पार्टी का गठन किया!

इस नई पार्टी का नाम था फॉरवर्ड ब्लॉक! फिर इन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के समय पूरे भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का विरोध और युद्ध विरोध का अभियान प्रारंभ कर दिया था !

इसी कारण इन्हें जुलाई 1940 ईस्वी में ब्रिटिश साम्राज्य द्वारा कोलकाता में गिरफ्तार कर लिया गया !जेल में उन्होंने अनशन प्रारंभ कर दिया था!

नेताजी के आमरण अनशन से डरकर ब्रिटिश हुकूमत ने उन्हें जेल से रिहा कर दिया !फिर नेताजी१९४१ जनवरी के मध्य में भारत से ही निकल गए! नेताजी नवंबर 1941 में बर्लिन (जर्मनी )में प्रकट हुए!

फिर वहां से जापान गए जापान से रासबिहारी बोस के साथ सिंगापुर पहुंच कर उन्होंने २१ अक्टूबर को आई एस ए अर्थात आजाद हिंद फौज के सरकार की स्थापना की।

२१ अक्टूबर को 1943 को सिंगापुर के मैदान में एक सभा को संबोधित करते हुए नेता जी ने नकहा था कि_”_मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि मैं आपके साथ अंधेरे में उजाले में और दुख में और सुख में बलिदान में और विजय में हर समय भूख और प्यास में कूच में और अंत में मौत में भी साथ दे सकता हूं

मुझे विश्वास है कि आप मेरे साथ जीवन और मरण में हैं। उन्होंने आजाद हिंद फौज के सैनिकों को आश्वासन दिया था कि हम चाहे जीवित रहे या ना रहे पर हमारा देश अंग्रेजी हुकूमत से आजाद होकर रहेगा ।

इसलिए हम लोगों को आजादी के लिए सब कुछ निछावर कर देना चाहिए। यहीं पर उन्होंने अपना विश्व विख्यात नारा__”तुम मुझे खून दो मैं तुम्हें आजादी दूंगा”! ऐसे खून में उबाल रहने वाले ओजस्वी और तेजस्वी उद्घोष से नेताजी ने नौजवानों का हौसला बढ़ाया था।

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