पति से तलाक लिए बगैर लिव इन में नहीं रह सकती विवाहित महिला, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला..!

राजेन्द्र देवांगन
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पति से तलाक लिए बगैर लिव इन में नहीं रह सकती विवाहित महिला, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला..!

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने मंगलवार  को पति को तलाक दिए बिना लिव इन रिलेशनशिप में रहने वाली एक विवाहित महिला की याचिका खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने कहा कि विवाहित महिला पति से तलाक लिए बिना किसी और के साथ लिव इन में नहीं रह सकती। इसके साथ ही कोर्ट ने उसकी सुरक्षा की माँग को खारिज कर दिया और दो हजार रुपए का जुर्माना लगा दिया।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, एक महिला ने सुरक्षा की माँग को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इस मामले पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की जस्टिस रेनू अग्रवाल की सिंगल बेंच ने कहा कि पति से बिना तलाक लिए एक विवाहित महिला लिव इन में नहीं रह सकती है। अगर ऐसे रिश्तों को मान्यता दी जाती है तो इससे अराजकता बढ़ेगी और समाज का ताना-बाना नष्ट हो जाएगा।

न्यायमूर्ति रेनू अग्रवाल ने कहा, “न्यायालय इस प्रकार के रिश्ते का समर्थन नहीं कर सकता, जो कि कानून का उल्लंघन है। हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का जीवनसाथी जीवित है या तलाक की डिक्री प्राप्त करने से पहले वह किसी अन्य व्यक्ति से शादी नहीं कर सकता है।”

बता दें कि उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले की रहने वाली याची ममता (बदला हुआ नाम) ने यह याचिका दाखिल की थी। याचिका में बताया गया कि वह और उसका लिव इन पार्टनर पहले से ही शादीशुदा हैं। ऐसे में उसे सुरक्षा दी जाए। इन तथ्यों पर गौर करने के बाद हाई कोर्ट का सुरक्षा देने से इनकार कर दिया है। इसके साथ ही याचिकाकर्ता पर 2,000 रुपए का जुर्माना भी लगाया है।

बता दें कि पिछले महीने इसी तरह के एक मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने एक विवाहित महिला और उसके लिव इन पार्टनर द्वारा दायर सुरक्षा याचिका को खारिज कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि इस प्रकार के ‘अवैध संबंध’ को अदालत द्वारा संरक्षित करने की आवश्यकता नहीं है।

दरअसल, जस्टिस रेनू अग्रवाल की पीठ के समक्ष ही 26 साल की मुस्लिम महिला की याचिका गई थी, जो अपने हिंदू प्रेमी के साथ रहना चाहती थी। महिला ने हाई कोर्ट में याचिका देकर कहा था कि उसे अपने रिश्तेदारों से जान का खतरा है। उसने अपनी और अपने प्रेमी की सुरक्षा की गुहार लगाई थी।

कोर्ट ने कहा था, “प्रथम याचिकाकर्ता (मुस्लिम महिला) मुस्लिम कानून (शरियत) के प्रावधानों के विपरीत दूसरे याचिकाकर्ता के साथ रह रही है। मुस्लिम कानून में विवाहित महिला शादीशुदा जिंदगी से बाहर नहीं जा सकती, इसलिए मुस्लिम महिला के इस कृत्य को ‘जिना’ और ‘हराम’ के तौर पर परिभाषित किया जाता है।” बता दें कि इस मुस्लिम महिला का शौहर खुद दूसरी बीवी के साथ रह रहा है।

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