Ramnami Community”हमारा तन ही मंदिर… रामनामी संप्रदाय के रोम-रोम में बसते हैं राम, बहुत दिलचस्प है इसके पीछे की कहानी…!

राजेन्द्र देवांगन
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Ramnami Community” कभी मंदिर नहीं जाता ये समुदाय फिर भी राम के सबसे बड़े भक्त, हैरान कर देने वाला रामनामी संप्रदाय…!

(ब्यूरो -सीता टंडन)

भगवान राम के नाम पर सियासी रोटियां खूब सेंकी जाती हैं। इन सबसे अलग छत्तीसगढ़ में एक रामनामी संप्रदाय है, जिनके रोम-रोम में भगवान राम बसते हैं। तन से लेकर मन तक तक पर भगवान राम हैं। इस समुदाय के लिए राम सिर्फ नाम नहीं बल्कि उनकी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ये राम भक्त लोग ‘रामनामी’ कहलाते हैं। राम की भक्ति भी इनके अंदर ऐसी है कि इनके पूरे शरीर पर ‘राम नाम’ का गोदना गुदा हुआ है। शरीर के हर हिस्से पर राम का नाम, बदन पर रामनामी चादर, सिर पर मोरपंख की पगड़ी और घुंघरू इन रामनामी लोगों की पहचान मानी जाती है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम की भक्ति और गुणगान ही इनकी जिंदगी का एकमात्र मकसद है।

रामनामी संप्रदाय के लिए राम का नाम उनकी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है.ये और बात है कि इस संप्रदाय की आस्था न तो अयोध्या के राम में है और ना ही मंदिरों में रखी जाने वाली राम की मूर्तियों में.इनका राम हर मनुष्य में, पेड़-पौधों में, जीव-जन्तु में और समस्त प्रकृति में समाया हुआ है.रामनामी संप्रदाय को मानने वाले आज भी लोगों के लिए कौतुहल के विषय बने हुए हैं.

राज्य के जांजगीर-चांपा के एक छोटे से गांव चारपारा में एक दलित युवक परशुराम द्वारा 1890 के आसपास स्थापित रामनामी संप्रदाय की स्थापना को एक ओर जहां भक्ति आंदोलन से जोड़ा जाता है. रामनमी समाज के लोगों का कहते हैं अपने पूरे शरीर में गुदे हुए राम नाम को दिखाते हुए रामनमी समाज लोग कहते हैं,“अब हमारे राम, हमारे शरीर के कण-कण में बसे हुए हैं. अब हमें राम से कौन दूर कर सकता है? मेरे राम तो यही हैं, मेरे मित्र, मेरे परिजन.”जिनकी आस्था राम नाम में है, उनके लिए मंदिर और मूर्तियों का कोई महत्व नहीं है. यही कारण है कि रामनामी न तो मंदिर जाते हैं और ना ही मूर्ति पूजा करते हैं.

लेकिन निर्गुण संतों की आध्यात्मिक परम्परा में वे रचे-बसे हैं. शुद्ध शाकाहारी व नशा जैसे व्यसनों से दूर, हिंदू समाज की तिलक-दहेज जैसी परम्परा के कट्टर विरोधी इस संप्रदाय के अधिकांश लोग खेती करते हैं और बचे हुए समय में राम भजन का प्रचार.इस संप्रदाय में किसी भी धर्म, वर्ण, लिंग या जाति का व्यक्ति दीक्षित हो सकता है. रहन-सहन और बातचीत में राम नाम का अधिकतम उपयोग करने वाले रामनामियों के लिए शरीर पर राम नाम गुदवाना अनिवार्य है.अपने शरीर के किसी भी हिस्से में राम नाम लिखवाने वालों को रामनामी, माथे पर दो राम नाम अंकित करने वाले को शिरोमणी, पूरे माथे पर राम नाम अंकित करने वाले को सर्वांग रामनामी और शरीर के प्रत्येक हिस्से में राम नाम अंकित कराने वालों को नखशिख रामनामी कहा जाता है.शरीर के विभिन्न हिस्सों में राम नाम लिखवाने के कारण इस संप्रदाय से जुड़े लोग अलग से ही पहचान में आ जाते हैं. लेकिन सिर से लेकर पैर तक, यहां तक की जीभ व तलवे में भी स्थाई रुप से राम नाम गुदवाने वाले रामनामियों के सामने अब अपनी पहचान का संकट खड़ा हो गया है.

रामनामी अपनी श्रद्धा के अनुसार शरीर में गोदना गुदवाते हैं

जांजगीर चांपा जिले से जुड़े एक गांव में रहने वाले युवा रामनामी रामलाल कहते हैं, “मेरे दादा-दादी, मां-बाप और बहन-बहनोई भी रामनामी हैं. मैंने भी राम नाम लिखवाया है. मुझमें न तो इतनी सामर्थ्य है और न ही इच्छा-शक्ति कि मैं पूरे चेहरे या पूरे शरीर पर राम नाम लिखवा लूं.”साल में एक बार लगने वाले रामनामी भजन मेले में संप्रदाय के लोग मिलते-बैठते हैं जहाँ नए लोगों को दीक्षित किया जाता है.

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