बिलासपुर/पेंड्रा। छत्तीसगढ़ में सुशासन और आम जनता की समस्याओं के त्वरित निराकरण के दावों के बीच पेंड्रा से सामने आया जमीन विवाद का एक मामला प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। हैरानी की बात यह है कि इस बार अपनी जमीन के लिए परेशान होने का दावा करने वाली कोई आम महिला नहीं, बल्कि सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी की आदिवासी महिला पार्षद हैं। बिलासपुर नगर निगम के वार्ड क्रमांक 59 की भाजपा पार्षद सुनीता जगत का आरोप है कि करीब 15 साल पहले खरीदी गई उनकी जमीन पर कुछ लोग कब्जा करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि वह लगभग एक साल से सीमांकन के लिए राजस्व विभाग के चक्कर लगा रही हैं।
मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि प्रदेश में भाजपा की सरकार है और जमीन की सुरक्षा के लिए प्रशासन से गुहार लगाने वाली जनप्रतिनिधि भी भाजपा की ही हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब सत्ताधारी दल की निर्वाचित जनप्रतिनिधि को अपनी जमीन का सीमांकन कराने के लिए इतना इंतजार करना पड़ रहा है, तो आम नागरिकों की शिकायतों का समाधान किस गति से होता होगा?
2011 में खरीदी जमीन, अब उसी को बचाने के लिए संघर्ष
भाजपा पार्षद सुनीता जगत के अनुसार, उन्होंने वर्ष 2011 में पेंड्रा के बिलासपुर रोड स्थित रमेश कोल से खसरा नंबर 2400/80/1 से संबंधित 1600 वर्गफीट जमीन खरीदी थी। उस समय उन्होंने भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखकर यह संपत्ति ली थी, लेकिन आज वही जमीन उनके लिए चिंता और परेशानी का कारण बन गई है।
पार्षद का आरोप है कि उनकी जमीन के आगे और पीछे की ओर कब्जे की कोशिश की जा रही है। उन्होंने इकबाल सिंह सहित अन्य लोगों पर जमीन हड़पने की नीयत से षड्यंत्र करने का आरोप लगाया है। हालांकि, आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित लोगों का पक्ष सामने आना बाकी है।
एक साल से सीमांकन का इंतजार, आखिर क्यों बेबस है राजस्व प्रशासन?
इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू जमीन के सीमांकन में कथित देरी है। सुनीता जगत का कहना है कि वह लगभग एक साल से संबंधित अधिकारियों के पास अपनी जमीन का सीमांकन कराने की मांग लेकर पहुंच रही हैं, लेकिन अब तक उन्हें राहत नहीं मिल सकी है।
सवाल यह है कि आखिर एक जमीन का सीमांकन कराने में इतनी देरी क्यों हो रही है? क्या राजस्व विभाग के सामने कोई तकनीकी या कानूनी अड़चन है, या फिर मामला प्रशासनिक उदासीनता का शिकार हो रहा है?
यदि पार्षद के दावे सही हैं, तो यह महज एक जमीन विवाद नहीं, बल्कि राजस्व विभाग की जवाबदेही और शिकायतों के निराकरण की व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न है।** आखिर सीमांकन की प्रक्रिया किस स्तर पर लंबित है और इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों ने अब तक क्या कार्रवाई की है, यह स्पष्ट होना चाहिए।
जमीन की कीमत बढ़ते ही कब्जे की कोशिश? पार्षद ने लगाए गंभीर आरोप
सुनीता जगत का आरोप है कि क्षेत्र में जमीन की कीमतें बढ़ने के बाद उनकी संपत्ति पर कुछ लोगों की नजर पड़ गई है। उन्होंने इकबाल सिंह और अन्य लोगों पर कथित रूप से जमीन हड़पने की कोशिश करने का आरोप लगाया है।
उनका कहना है कि जमीन को लेकर पैदा हुए विवाद के कारण वह मानसिक रूप से परेशान हैं। जिस जमीन को उन्होंने वर्षों पहले खरीदा था, आज उसकी सीमाएं स्पष्ट कराने के लिए उन्हें अधिकारियों के पास बार-बार जाना पड़ रहा है।
हालांकि, जमीन की वास्तविक स्थिति, कथित कब्जे और आरोपों की सत्यता राजस्व अभिलेखों, विधिवत सीमांकन और संबंधित पक्षों की जांच के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।
भाजपा की सरकार, भाजपा की पार्षद… फिर भी सुनवाई के लिए इंतजार!
इस मामले ने प्रदेश सरकार की प्रशासनिक व्यवस्था को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। छत्तीसगढ़ में भाजपा की सरकार है। सरकार लगातार सुशासन, पारदर्शिता और जनसमस्याओं के त्वरित समाधान की बात करती है। लेकिन उसी पार्टी की एक आदिवासी महिला पार्षद अपनी जमीन का सीमांकन कराने के लिए लंबे समय से परेशान होने का दावा कर रही हैं।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर शासन की योजनाओं और प्रशासनिक दावों का लाभ धरातल पर कितना पहुंच रहा है?
क्या राजस्व विभाग में आम आदमी को छोटे-छोटे कामों के लिए महीनों भटकना पड़ता है? क्या जमीन संबंधी शिकायतों के निपटारे की कोई प्रभावी निगरानी व्यवस्था है? और यदि है, तो पार्षद की शिकायत का समाधान अब तक क्यों नहीं हुआ?
यह सवाल केवल एक पार्षद का नहीं, बल्कि उन तमाम जमीन मालिकों की चिंता से जुड़ा है, जिन्हें अपनी संपत्ति की सुरक्षा और राजस्व संबंधी कार्यों के लिए सरकारी कार्यालयों का सहारा लेना पड़ता है।
आदिवासी महिला जनप्रतिनिधि की परेशानी ने खड़े किए सवाल
सुनीता जगत का आदिवासी महिला जनप्रतिनिधि होना भी इस मामले को संवेदनशील बनाता है। एक निर्वाचित पार्षद होने के बावजूद यदि उन्हें अपनी शिकायत के समाधान के लिए बार-बार प्रशासन के पास जाना पड़ रहा है, तो इससे व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठते हैं।
सरकार की जिम्मेदारी केवल योजनाओं और घोषणाओं तक सीमित नहीं है। आम नागरिकों की शिकायतों का समयबद्ध और निष्पक्ष निराकरण सुनिश्चित करना भी प्रशासन की मूल जिम्मेदारी है।
ऐसे मामलों में सबसे जरूरी है कि अधिकारी जमीन के दस्तावेजों की जांच कर नियमानुसार सीमांकन की प्रक्रिया पूरी करें, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके और किसी भी पक्ष के साथ अन्याय न हो।
प्रशासन की चुप्पी कब टूटेगी? जवाबदेही तय होगी या चलता रहेगा चक्कर लगाने का सिलसिला?
अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि पार्षद सुनीता जगत की शिकायत पर राजस्व प्रशासन कब तक कार्रवाई करेगा। यदि सीमांकन का आवेदन लंबे समय से लंबित है, तो इसके पीछे क्या कारण हैं? क्या किसी अधिकारी ने देरी की वजह बताई है? और क्या इस प्रकरण की समीक्षा कर जिम्मेदारी तय की जाएगी?
मामले में संबंधित राजस्व अधिकारियों और आरोपित पक्ष की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना अभी बाकी है। इसलिए प्रशासनिक लापरवाही अथवा जमीन पर अवैध कब्जे को जांच से पहले स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता।
लेकिन एक बात स्पष्ट है कि एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि द्वारा लगभग एक साल से सीमांकन के लिए भटकने का आरोप लगाना अपने आप में प्रशासन के लिए गंभीर सवाल है।** अब जरूरत है कि राजस्व विभाग शिकायत की स्थिति सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करे, नियमानुसार कार्रवाई करे और यदि अनावश्यक देरी हुई है तो उसकी जवाबदेही भी तय हो।
अब देखना यह होगा कि सुशासन का दावा करने वाली सरकार के अधिकारी भाजपा की अपनी आदिवासी महिला पार्षद की शिकायत का समाधान कितनी जल्दी करते हैं, या फिर जमीन का सीमांकन कराने के लिए उनका संघर्ष यूं ही जारी रहेगा।**
भाजपा सरकार में भाजपा की आदिवासी पार्षद ही न्याय के लिए परेशान! 15 साल पहले खरीदी जमीन का सीमांकन नहीं, प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
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