30-40 हजार देकर लेते थे लाखों के गहने: ऐसी कालोनी को बनाते थे निशाना, जहां कम लोग, गैंती से तोड़ते से दरवाजा, यही बना क्लू

राजेन्द्र देवांगन
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राजधानी के आउटर में एक के बाद एक सीरियल चोरी करने वाले गैंग ने कभी वारदात के पहले रेकी नहीं की। शाम होते ही गैंग के सदस्य बाइक से ऐसी बड़ी कालोनी में घुसते जहां कम लोग बसे हैं और मकान के पीछे खेत या खुली जगह है। उनके हाथ में लाल गैंती रहती थी। उसी से

गैंग में शामिल सराफा कारोबारी कभी चोरी के गहने तौलते नहीं थे। लाखों के गहने लेकर वे 30-35 हजार थमा देते थे। सराफा कारोबारियों के दलालों का भी चोरों से लिंक था। हर बार चोरी के गहने बिकने पर दलालों को भी कमीशन मिलता था। पूरा गिरोह बेहद पेशेवर तरीके से काम कर रहा था। पुलिस को एक-दो जगह नकाबपोश चोरों के हाथ में लाल गैंती का सीसीटीवी फुटेज मिला। यही पुलिस के लिए बड़ा क्लू साबित हुआ।

जहां सीसीटीवी कैमरे नहीं वहीं जाकर चोरी करते थे, इसलिए पहचान में देरी

चोर चूंकि आउटर की नई कालोनियों को निशाना बना रहे थे। ज्यादातर जगहों पर सीसीटीवी कैमरे नहीं लगे हैं। इस वजह से पुलिस को उनका फुटेज नहीं मिल रहा था। इस बीच चोरियां लगातार हो रही थीं। कई दिनों की तलाश के बाद एक-दो जगह लाल गैंती चोरों के हाथ में दिखी।

पुलिस की टीम उन दुकानों में पहुंची जहां लाल गैंती बिकती है। वहां कड़ी दर कड़ी जांच करने पर चोरों का इनपुट मिला। कुछ संदिग्ध मोबाइल नंबर भी पुलिस के हाथ आए। उसके आधार पर तहकीकात शुरू की गई। आखिरकार पुलिस को सृजन शर्मा के बारे में जानकारी मिली। वह पहले भी चोरी के केस में पकड़ा जा चुका है। इसलिए उसे घेरा गया। उससे पूछताछ़ के बाद पूरे गैंग का खुलासा हुआ।

जिस मकान में अंधेरा नजर आता वहां घुसते थे बेधड़क पुलिस अफसरों के अनुसार तीनों चोर सृजन, उमेश उपाध्याय और सफीक मोहम्मद दो बाइक में निकलते थे। गाड़ी को कालोनी से दूर खड़ी कर सूने मकान की तलाश करते थे। इस दौरान जो मकान अलग-थलग और उसमें अंधेरा नजर आता, वे बेधड़क वहां घुस जाते थे। उन्होंने 50 से ज्यादा मकानों के ताले तोड़े हैं, लेकिन जहां ज्यादा पैसे या गहने चोरी नहीं हुए वहां रहने वालों ने रिपोर्ट ही दर्ज नहीं कराई है।

गहने लेकर तुरंत गलाकर उसकी पहचान मिटाते थे

सराफा कारोबारी चोरों से औने पौने में जेवर खरीदने के बाद उसे तुरंत गलाकर उसकी पहचान मिटा देते थे। सृजन का उरला के कारोबारी भूषण देवांगन से लिंक था। उमेश मुंगेली का रहने वाला है। उसका संबंध जय कुमार से था। सफीक की पहचान बिलासपुर के कारोबारी थे। हालांकि तीनों सीधे सराफा कारोबारियों से नहीं जुड़े थे। उनका परिचय दलालों ने कराया था। वे हर बार दलालों के माध्यम से ही जेवर बिकवाते थे, जिससे उन्हें तुरंत पैसे मिल जाते थे।

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